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बुद्धि-परीक्षाओं का अर्थ, प्रकार और आवश्यकता Intelligence Tests

बुद्धि क्या है ? उसके सम्बन्ध में जिन मुख्य सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया गया है, उनका संक्षिप्त विवरण दीजिए।
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Intelligence Tests

बुद्धि परीक्षाओं का अर्थ 

बुद्धि को लेकर विद्वानों में अनेक मतभेद हैं। कुछ इसे सामान्य योग्यता मानते हैं तो कुछ नवीन परिस्थितियों में समायोजन। गाल्टन इसे पहचानने तथा सीखने की योग्यता मानता है। जब भी वैयक्तिक भिन्नताओं के मापन पर विचार किया जाता है तो बुद्धि भी उसी संदर्भ में देखी परखी जाती है। प्रत्येक व्यक्ति में बौद्धिक या मानसिक योग्यता भिन्न होती है। शिक्षा तथा समाज के अन्य क्षेत्रों में बुद्धि मापन को अत्यधिक महत्वपूर्ण माना जाता रहा है।

आधुनिक शिक्षा मनोविज्ञान की एक सबसे महत्वपूर्ण देन है - बुद्धि का मापन करने के लिए बुद्धि - परीक्षायें। बुद्धि मापन का अर्थ है - बालक की मानसिक योग्यता का माप करना या यह ज्ञात करना कि उसमें कौन-कौन-सी मानसिक योग्यताएँ हैं और कितनी है? प्रत्येक बालक में इस प्रकार की कुछ जन्मजात योग्यताएँ होती हैं। बुद्धि परीक्षा द्वारा उसकी इन्हीं योग्यताओं या उसके मानसिक विकास का अनुमान लगाया जाता है। ड्रेवर के शब्दों में हम कह सकते हैं - "बुद्धि परीक्षा किसी प्रकार का कार्य या समस्या होती है, जिसकी सहायता से एक व्यक्ति के मानसिक विकास के स्तर का अनुमान लगाया जा सकता है, या मापन किया जा सकता है।"

बुद्धि-परीक्षाओं की आवश्यकता

शिक्षा प्राप्त करने वाले बालकों की योग्यताओं में स्वाभाविक अन्तर होता है। इस अन्तर के कारण सब बालक समान रूप से प्रगति नहीं कर पाते हैं। ऐसी दशा में शिक्षक के समक्ष एक जटिल समस्या उपस्थित हो जाती है। बुद्धि परीक्षा, बालकों में पाये जाने वाले अन्तर का ज्ञान प्रदान करके शिक्षक को समस्या का समाधान करने में सहायता देती है। ब्लेयर, जोन्स एवं सिम्पसन का कथन है - “विद्यालय में बुद्धि परीक्षाओं का प्रयोग व्यावहारिक कार्यों के लिए और साधारणतया यह ज्ञात करने के लिए किया जाता है कि बालक, विद्यालय के कार्य में कितनी सफलता प्राप्त कर सकते है।"

बुद्धि-परीक्षाओं का इतिहास

बी. बी. सामन्त के अनुसार भारत के लिए बुद्धि परीक्षाएँ कोई नई बात नहीं है। वेदों और पुराणों में जहाँ तहाँ बुद्धि-परीक्षाओं के उल्लेख मिलते हैं। यक्ष और युधिष्ठिर का सम्वाद, बुद्धि परीक्षा का प्रत्यक्ष उदाहरण है। छात्रों की बुद्धि परीक्षा के लिये जटिल प्रश्नों, पहेलियों, समस्याओं आदि का प्रयोग किया जाता था। तक्षशिला और नालन्दा विश्वविद्यालयों की अध्ययन विधियों में बुद्धि-परीक्षाओं का महत्वपूर्ण स्थान था। आज परिस्थिति ऐसी है कि भारत विदेशी विद्वानों द्वारा बनाई गई बुद्धि-परीक्षा की विधियों का प्रयोग कर रहा है।

यूरोप में बुद्धि परीक्षा की दिशा में 18वीं शताब्दी में कार्य प्रारम्भ किया गया। सर्वप्रथम भारत के समान वहाँ भी शारीरिक लक्षणों को बुद्धि के माप का आधार बनाया गया। उदाहरणार्थ, हम भारत में आज भी सुनते हैं - “छिद्रदन्ता क्वचित् मूर्खाः", अर्थात् छितरे दाँतों वाला कोई-कोई ही मूर्ख होता है। इसी प्रकार स्विट्जरलैण्ड के प्रसिद्ध विद्वान् लैवेटर ने 1772 में विभिन्न शारीरिक लक्षणों को बुद्धि का आधार घोषित किया। उस समय से बुद्धि के मापन का कार्य किसी न किसी रूप में यूरोप में चलता रहा।

1879 में विलियम वुण्ट ने जर्मनी के लीपज़िग नामक नगर में प्रथम मनोवैज्ञानिक प्रयोगशाला स्थापित करके बुद्धिमापन के कार्य को वैज्ञानिक आधार प्रदान किया। इस प्रयोगशाला में बुद्धि का माप, यंत्रों की सहायता से किया जाता था।

वुण्ट के कार्य से प्रोत्साहित होकर अन्य देशों के वैज्ञानिकों ने भी बुद्धि-परीक्षा का कार्य आरम्भ किया। इनमें उल्लेखनीय हैं - फ्रांस में बिने, इंगलैंड में विंच, जर्मनी में मैनमान और अमेरिका में थॉर्नडाइक एवं टर्मन। इन मनोवैज्ञानिकों में सबसे अधिक सफलता प्राप्त हुई - बिने को, जिसने साइमन की सहायता से “बिने-साइमन बुद्धि मानक्रम" का निर्माण किया। टरमन ने उसमें संशोधन करके उसे 'स्टैनफोर्ड-बिने-मानक्रम' का नाम दिया।

बुद्धि परीक्षण के क्षेत्र में विश्व के सभी उन्नत देशों में असंख्य परीक्षण बनाये गये हैं। भारत में राज्यों की मनोविज्ञान शालाओं, विश्वविद्यालय, राष्ट्रीय शिक्षक प्रशिक्षण अनुसंधान परिषद तथा अन्य अनेक निजी एवं सार्वजनिक संस्थान इस दिशा में सक्रिय हैं।

मानसिक आयु व बुद्धि-लब्धि 

बुद्धि परीक्षण का आधार मानसिक एवं शारीरिक आयु के मध्य का सम्बन्ध है। बुद्धि परीक्षा के परिणाम बुद्धि-लब्धि के द्वारा दिखाये जाते हैं। बुद्धि-लब्धि मानसिक आयु के अभाव में मापी नहीं जा सकती। अतः मानसिक आयु व बुद्धि-लब्धि की अवधारणा को जानना भी आवश्यक है। 

मानसिक आयु का अर्थ 

मानसिक आयु बालक या व्यक्ति की सामान्य योग्यता बताती है। गेट्स एवं अन्य के अनुसार - "मानसिक आयु हमें किसी व्यक्ति की बुद्धि-परीक्षा के समय बुद्धि-परीक्षा द्वारा ज्ञात की जाने वाली सामान्य मानसिक योग्यता के बारे में बताती है।"

बुद्धि-लब्धि का अर्थ 

बुद्धि-लब्धि, बालक या व्यक्ति की सामान्य योग्यता के विकास की गति बताती है। कोल एवं ब्रूस के शब्दों में - "बुद्धि-लब्धि यह बताती है कि मानसिक योग्यता में किस गति से विकास हो रहा है।"

बुद्धि-लब्धि निकालने की विधि (Method of Finding IQ)

मानसिक आयु का विचार आरम्भ करने का श्रेय बिने को प्राप्त है । टर्मन ने उसके विचार को स्वीकार किया, पर अपने परीक्षणों के आधार पर वह इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि मानसिक आयु बालक के मानसिक विकास की वृद्धि के बारे में नहीं बता सकती, क्योंकि विभिन्न बालकों में मानसिक विकास की गति विभिन्न होती है। इस गति को मालूम करने के लिए उसने 'बुद्धि-लब्धि' के विचार को जन्म दिया। बुद्धि-लब्धि का सूत्र है-

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उदाहरणार्थ, यदि बालक की मानसिक आयु 10 वर्ष और जीवन या वास्तविक आयु 8 वर्ष है, तो उसकी बुद्धि-लब्धि 125 होगी; 

बुद्धि-लब्धि का वर्गीकरण (Classification of IQ)

टर्मन ने बुद्धि-लब्धि का वर्गीकरण निम्न प्रकार से किया है-

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बुद्धि परीक्षाओं के प्रकार  

बुद्धि परीक्षाओं को सामान्य रूप में दो वर्गों में विभाजित किया जाता है 
  1. वैयक्तिक।
  2. सामूहिक।

वैयक्तिक बुद्धि परीक्षा 

यह परीक्षा एक समय में एक व्यक्ति की ली जाती है। इसका आरम्भ बिने ने किया। बिने द्वारा निर्मित परीक्षण का संशोधन साइमन ने किया। इसलिये इस परीक्षण को बिने साइमन परीक्षण भी कहा जाता है।

सामूहिक बुद्धि-परीक्षा 

यह परीक्षा एक समय में अनेक व्यक्तियों की ली जाती है। इसका आरम्भ प्रथम विश्वयुद्ध (1914-18) के समय अमरीका में हुआ। कारण यह था कि वहाँ की सरकार मनुष्यों की मानसिक योग्यताओं के अनुसार ही उनको सेना में सैनिकों अफसरों और अन्य कर्मचारियों के पदों पर नियुक्त करना चाहती थी। 

वैयक्तिक और सामूहिक - दोनों प्रकार की परीक्षाओं के दो रूप हो सकते हैं 
  1. भाषात्मक।
  2. क्रियात्मक।

भाषात्मक परीक्षा

को एवं क्रो के अनुसार, इस परीक्षा में भाषा का प्रयोग किया जाता है और इसके द्वारा अमूर्त बुद्धि की परीक्षा ली जाती है। इसका मुख्य उद्देश्य यह ज्ञात करना होता है कि व्यक्ति को लिखने-पढ़ने का कितना ज्ञान है। उसे प्रश्नों के उत्तर लिखकर, उनके सामने गोला या गुणा का चिह्न बनाकर या रेखांकित करके देने पड़ते हैं।

इस परीक्षा में आगे लिखे प्रकार के प्रश्न पूछे जाते हैं 
  1. अंकगणित के प्रश्न
  2. निर्देश के अनुसार प्रश्नों के उत्तर
  3. व्यावहारिक ज्ञान के सम्बन्ध में प्रश्न
  4. दिये हुए शब्दों के समानार्थी या विलोम शब्द लिखना
  5. वाक्यों के बेतरतीब लिखे हुए शब्दों को तरतीब में लिखना, इत्यादि ।

क्रियात्मक परीक्षा 

क्रो एवं क्रो के अनुसार इस परीक्षा का प्रयोग उन व्यक्तियों के लिए किया जाता है, जिनको भाषा का ज्ञान कम होता है या जो लिखना-पढ़ना नहीं जानते हैं। इसके द्वारा मूर्त बुद्धि की परीक्षा ली जाती है। इस परीक्षा विधि में वास्तविक वस्तुओं का प्रयोग किया जाता है और परीक्षार्थियों से कुछ समस्यापूर्ण कार्य करने के लिए कहा जाता है
  1. चित्रों के बिखरे हुए टुकड़ों को क्रम से लगाकर चित्रों को पूरा करना । 
  2. किसी दिए हुए चित्र में असम्भव बातों को बताना।
  3. तिकोनी, चौकोर और गोल वस्तुओं के .टुकड़ों को रखकर आकृति को पूरा करना। 
  4. भूलभुलैयाँ में से होकर बाहर जाने का मार्ग बताना, इत्यादि ।

कुछ प्रसिद्ध बुद्धि परीक्षाओं का वर्णन -

वैयक्तिक भाषात्मक परीक्षाएँ

बिने साइमन बुद्धि स्केल 

वैयक्तिक बुद्धि परीक्षा के सर्वप्रथम सफल प्रयास का श्रेय एल्फ्रेड बिने को है। वह पेरिस विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान का प्रोफेसर था। 1890 के लगभग उस नगर के प्राथमिक विद्यालयों के प्रबन्धकों ने उससे ऐसे बालकों का पता लगाने में सहायता माँगी, जो मन्दबुद्धि थे, ताकि उनको शिक्षा प्राप्त करने के लिए विशिष्ट विद्यालयों में भेजा जा सके। बिने ने इस कार्य में अपने सहयोगी मनोवैज्ञानिक थियोडोर साइमन से सहायता ली। दोनों मनोवैज्ञानिकों ने अनेक परीक्षाओं के बाद 1905 में अपनी परीक्षा-विधि प्रकाशित की, जिसे बिने-साइमन बुद्धि मानक्रम कहा जाता है। उन्होंने इसको 1908 में और फिर 1911 में परिवर्तित और संशोधित करके पूर्ण बनाने का प्रयास किया।

बिने-साइमन की बुद्धि परीक्षा विधि 3 से 15 वर्ष तक के बालकों के लिए थी। प्रत्येक वर्ष के बालकों के लिए 5 प्रश्न या कार्य थे, पर 4 वर्ष के बालकों के लिए केवल 4 प्रश्न थे और 11 एवं 13 वर्ष के बालकों के लिए कोई प्रश्न नहीं थे। इस प्रकार 1911 के स्केल में प्रश्नों की कुल संख्या 54 थी। ये प्रश्न इस प्रकार बनाये गये थे कि कम आयु के बालक अधिक आयु वाले बालकों के प्रश्नों के उत्तर नहीं दे सकते थे। हम 3 और 4 वर्ष की आयु के बालकों के प्रश्नों के उदाहरण दे रहे हैं

तीन वर्ष की आयु के लिए
  • अपना नाम बताना।
  • अपने मुँह, नाक और कान को उँगली से बताना।
  • किसी चित्र को देखकर उसकी मुख्य बातें बताना। 
  • छः शब्दों के सरल वाक्य को दोहराना।
  • दो अंकों को एक बार सुनकर दोहराना; जैसे-2-5, 3-7, 6-8 आदि।
चार वर्ष की आयु के लिए
  • अपने को बालक या बालिका होना बताना। 
  • दो रेखाओं में छोटी और बड़ी को पहचानना ।
  • चाभी, चाकू और पैन को देखकर उसका नाम बताना।
  • तीन अंकों को एक बार सुनकर दोहराना; जैसे-2-5-7, 4-6-9 आदि।
यदि बालक अपनी आयु के लिए निर्धारित सब प्रश्नों के उत्तर दे देता था, तो उसे साधारण बुद्धि वाला माना जाता था। यदि वह अपनी आयु से अधिक आयु वाले बालकों के प्रश्नों के उत्तर दे देता था, तो उसकी मानसिक आयु को उसकी जीवन - आयु से अधिक समझा जाता था और उसे श्रेष्ठ बुद्धि वाला बालक माना जाता था। यदि वह अपनी आयु के लिए निर्धारित प्रश्नों के उत्तर नहीं दे पाता था, तो उसकी मानसिक आयु को उसकी जीवन-आयु से कम समझा जाता था और उसे मन्द बुद्धि माना जाता था।

उदाहरणार्थ, यदि 8 वर्ष की आयु का बालक अपनी आयु के सब प्रश्नों के उत्तर दे देता था, तो उसकी मानसिक आयु 8 वर्ष मानी जाती थी। यदि वह केवल 7 वर्ष वाले बालकों के प्रश्नों के उत्तर दे पाता था, तो उसकी मानसिक आयु 7 वर्ष समझी जाती थी। यदि वह अपने और 10 वर्ष की आयु के बालकों के प्रश्नों के भी उत्तर दे देता था, तो उसकी मानसिक आयु 10 वर्ष मानी जाती थी। यदि वह 9 वर्ष वाले बालक के केवल 3 प्रश्नों का और 10 वर्ष वाले बालकों के केवल 1 प्रश्न का उत्तर दे पाता था, तो उसकी मानसिक आयु में प्रत्येक प्रश्न के लिए ½ वर्ष जोड़ किया जाता था।
8+3/ 5 +1/5 = 44/5 वर्ष की मानसिक आयु।

'बिने-स्केल' का सबसे मुख्य दोष यह था कि यदि किसी आयु का बालक अपनी आयु के लिए निर्धारित प्रश्नों के उत्तर नहीं दे पाता था, तो उसकी मानसिक आयु उसकी जीवन-आयु से कम मानी जाती थी। रॉस का कथन है - “बिने-स्केल की एक उपयुक्त आलोचना यह है कि या तो बालक सब प्रश्नों का उत्तर देकर सफल हो या एक भी प्रश्न का उत्तर न दे सकने के कारण असफल हो।"

स्टैनफोर्ड-बिने स्केल

अपने दोषों के बावजूद भी बुद्धि का अनुमान लगाने की समस्या पर बिने  के अद्वितीय कार्य ने शिक्षा संसार में हलचल मचा दी और कई देशों के उत्साही मनोवैज्ञानिकों का ध्यान उसकी ओर गया। क्योंकि उसका माऩक्रम पेरिस की गलियों के उपेक्षित बालकों के लिए बनाया गया था, इसलिए उनमें सुधार आवश्यक समझा गया। इस दिशा में लन्दन में डा. सिरिल बर्ट और अमरीका में स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान के प्रोफेसर लेविस एम. टर्मन ने अभिनन्दनीय कार्य किया। टरमन ने बिने के मानक्रम के अनेक दोषों को दूर करके 1916 में उसे एक नया रूप प्रदान किया, जो 'स्टैनफोर्ड-बिने-मानक्रम' के नाम से प्रसिद्ध हुआ। उसने 1937 में और फिर 1960 में अपने सहयोगी मोड ए. मैरिल की सहायता से उसे पूर्णतया निर्दोष बना दिया।

यह स्केल 2 से 14 वर्ष तक के बालकों के लिए है। इसमें कुल 90 प्रश्नावलियाँ हैं, जो इस प्रकार हैं - 
  • 3 से 10 वर्ष तक के बालकों के लिए 6
  • 12 वर्ष के बालकों के लिए 8
  • 14 वर्ष के बालकों के लिए 6
  • सामान्य वयस्कों के लिए 6 
  • श्रेष्ठ वयस्कों के लिए 6
  • अन्य प्रश्नावलियाँ 16
  • 11 से 13 वर्ष के बालकों के लिए कोई प्रश्न नहीं है। 
इन 90 प्रश्नावलियों में बिने की प्रश्नावलियों से केवल 19 प्रश्न लिये गये हैं। 
3 वर्ष की आयु के बालकों के लिए निम्नांकित प्रश्न हैं
  • अपने परिवार का नाम बताना। 
  • अपने को बालक या बालिका (लिंग ज्ञान) होना बताना।
  • 6-7 अक्षरों के वाक्य को दोहराना।
  • अपने मुँह, नाक, आँखों आदि को उँगली से बताना।
  • चाकू, चाभी, पैन आदि को देखकर उनका नाम बताना। 
  • किसी चित्र को देखकर उसकी मुख्य बातें बताना।
2 से 5 वर्ष तक प्रत्येक 6 माह के बाद परीक्षा ली जाती है (अर्थात् 2, 2.5, 3 वर्ष)।

पाँच वर्ष के बाद वर्ष में केवल एक परीक्षा ली जाती है। प्रत्येक आयु के बालकों की प्रश्नावली के दो भाग हैं - L और M, प्रत्येक भाग में 6 कार्य या प्रश्न हैं। 2 से 5 वर्ष तक के बालकों को वे इस प्रकार करने पड़ते हैं
  • 2 वर्ष के बालकों के लिए L भाग के 6 प्रश्न
  • 22 वर्ष के बालकों के लिए M भाग के 6 प्रश्न
  • 3 वर्ष के बालकों के लिए L भाग के 6 प्रश्न
  • 32 वर्ष के बालकों के लिए M भाग के 6 प्रश्न परीक्षाएँ इसी क्रम में 5 वर्ष की आयु तक होती हैं। 
उसके बाद बालकों को L और M दोनों भागों के प्रश्न एक साथ करने पड़ते है।

विभिन्न आयु के बालकों के लिए प्रत्येक प्रश्न के लिए मानसिक आयु निश्चित है। उदाहरणार्थ, 3 से 10 वर्ष तक के बालकों के लिए प्रत्येक प्रश्न के लिए 2 माह की मानसिक आयु, 12 वर्ष वालों के लिए 3 माह की, 14 वर्ष वालों के 4 माह की। यदि 12 वर्ष की आयु का बालक 10 वर्ष की आयु के बालकों के सब प्रश्नों का, 12 वर्ष की आयु के बालकों के 5 प्रश्नों का और 14 वर्ष वालों के 2 प्रश्नों का उत्तर देता है, तो उसकी मानसिक आयु होती है 10 वर्ष + 15 माह + 8 माह = 11 वर्ष और 11 माह।

वैयक्तिक क्रियात्मक परीक्षाएँ

पोरटियस भूलभुलैयाँ टेस्ट (Porteus Maze Test) 

यह परीक्षण 3 से 14 वर्ष तक के बालकों के लिए है। भूलभुलैयाँ का निर्माण इस प्रकार किया गया है कि वे आयु की वृद्धि के साथ-साथ क्रमश: जटिलतर होती जाती हैं। जिस बालक की परीक्षा ली जाती है, उसे एक पेंसिल और कागज पर बना हुआ भूलभुलैयाँ का एक चित्र दे दिया जाता है। बालक को पेंसिल से उसमें से बाहर निकलने का निशान लगाकर मार्ग अंकित करना पड़ता है। ऐसा करने के लिए 3 से 11 वर्ष तक के बालकों को दो अवसर और 12 से 14 वर्ष तक के बालकों को चार अवसर दिये जाते हैं। यदि वे अपने प्रयास में असफल होते हैं, तो उनकी बुद्धि का विकास उनकी आयु के अनुपात से कम समझा जाता है। इस परीक्षण के सम्बन्ध में गैरेट ने लिखा है - 'यह परीक्षण कम बुद्धि वाले बालकों के लिए विशेष रूप से उपयोगी सिद्ध हुआ है। इससे न केवल बालक की मानसिक योग्यता का, वरन् उसकी नियोजन की योग्यता का भी ज्ञान प्राप्त होता है।'
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वेश्लर बैल्यूव टेस्ट 

इस परीक्षण का निर्माण 1944 में 10 से 60 वर्ष की आयु के व्यक्तियों की बुद्धि परीक्षा लेने के लिए किया गया था। 1955 में इसे संशोधित करके 16 से 64 वर्ष तक के वयस्कों के लिए कर दिया गया। इसमें विभिन्न आयु के व्यक्तियों के लिए 5 मौखिक और 5 क्रियात्मक परीक्षण अग्रलिखित प्रकार के हैं 
  1. ज्ञान और सूचना सम्बन्धी प्रश्न 
  2. गणित के प्रश्न
  3. शब्दावली
  4. चित्र के भागों को तरतीब से लगाकर चित्र को पूरा करना
  5. विभिन्न वस्तुओं के टुकड़ों को विधिपूर्वक रखकर उनकी आकृतियों को पूर्ण करना। 
इस परीक्षण के प्रयोग में साधारणतः एक घण्टे से कुछ अधिक समय लगता है। वयस्कों की बुद्धि-परीक्षा लेने के लिए इसका बहुत प्रचलन है। इसमें मानसिक आयु निकालने के दोष को दूर कर दिया गया है।

सामूहिक भाषात्मक परीक्षाएँ

आर्मी ऐल्फा टेस्ट 

इसका निर्माण अमरीका में प्रथम विश्वयुद्ध के समय सैनिकों और सेना के अन्य कर्मचारियों एवं पदाधिकारियों का चुनाव करने के लिए किया गया था। इसका प्रयोग केवल शिक्षित मनुष्यों के लिये किया जा सकता था। इसकी परीक्षा सामग्री बहुत कुछ स्टेनफोर्ड बिने स्केल की सामग्री से मिलती-जुलती थी। कोल एवं ब्रूस  के अनुसार, इस टेस्ट का प्रयोग करके लगभग 20,00,000 सैनिकों की बुद्धि-परीक्षा ली गई।

सेना सामान्य वर्गीकरण टेस्ट 

इसका निर्माण अमरीका में द्वितीय विश्वयुद्ध के समय सेना के विभिन्न विभागों के लिए सैनिकों का वर्गीकरण करने के लिए किया गया था। इस परीक्षण में सैनिकों को तीन प्रकार की समस्याओं का समाधान करना पड़ता था - शब्दावली, गणित और वस्तु गणना सम्बन्धी समस्याएँ । गैरेट के अनुसार इस टेस्ट का प्रयोग लगभग 12 लाख सैनिकों की बुद्धि परीक्षा लेने के लिए किया गया।

सामूहिक क्रियात्मक परीक्षाएँ 

आर्मी बीटा टेस्ट 

इस परीक्षण का निर्माण अमरीका में प्रथम विश्वयुद्ध के समय सेना के विभिन्न पदों और विभागों में कार्य करने वाले मनुष्यों का चुनाव करने के लिए किया गया था। इसका प्रयोग उन मनुष्यों के लिए किया गया था, जो अशिक्षित थे, या अँग्रेजी भाषा नहीं जानते थे। वस्तुओं की गणना; अंकित चित्र में विभिन्न वस्तुओं में एक-दूसरे से सम्बन्ध बताना; चित्र की उन वस्तुओं पर चिह्न लगाना, जिनका किसी से किसी प्रकार का सम्बन्ध नहीं है, आदि समस्याएँ इस परीक्षण में रखी गयीं।

शिकागो क्रियात्मक टेस्ट 

यह टेस्ट 6 वर्ष की आयु के बालकों से लेकर वयस्कों तक के लिए है। यह 13 वर्ष की आयु के बालकों की बुद्धि-परीक्षा लेने के लिए विशेष रूप से उपयोगी सिद्ध हुआ है। इसमें अग्रांकित प्रकार की क्रियाएँ हैं - विभिन्न प्रकार की आकृतियों में समानता और असमानता की बातें बताना। चित्र के टुकड़ों को व्यवस्थित करके उसे पूर्ण करना, लकड़ी के टुकड़ों की सहायता से गणना करना, अनेक प्रकार की वस्तुओं में से समान वस्तुओं को छाँटकर अलग-अलग वर्गों में रखना।

वैयक्तिक व सामूहिक परीक्षाओं की तुलना

डगलस एवं हालैण्ड ने वैयक्तिक और सामूहिक परीक्षाओं के अग्रलिखित गुण और दोष बताकर उनकी तुलना की है।

वैक्तिक परीक्षासामूहिक परीक्षा
1. यह परीक्षा केवल अनुभवी या प्रशिक्षित व्यक्ति ले सकता है।
2. यह परीक्षा छोटे बालकों के लिये अधिक उपयुक्त है।
3. इस परीक्षा में परीक्षक और परीक्षार्थी का निकट सम्बन्ध होता है।
4. इस परीक्षा में परीक्षक, परीक्षार्थी के गुण-दोष का पूर्ण अध्ययन कर सकता है।
5. इस परीक्षा से परीक्षक, परीक्षार्थी की असफलता के कारणों का पता लगा सकता है।
6. इस परीक्षा में परीक्षार्थी अपने कार्य के प्रति सतर्क रहता है।
7. इस परीक्षा में परीक्षार्थी की भाषा और व्यवहार का पूर्ण ज्ञान हो जाता है।
8. इस परीक्षा के प्रश्नों को बनाने के लिये काफी परिश्रम और योग्यता की आवश्यकता है।
9. इस परीक्षा के निष्कर्ष बहुत प्रामाणिक और विश्वसनीय होते हैं।
10. इस परीक्षा के लिये बहुत धन और समय की आवश्यकता है।
1. यह परीक्षा सामान्य योग्यता का व्यक्ति ले सकता है।
2. यह परीक्षा बड़े बालकों और वयस्कों के लिये अधिक उपयुक्त है।
3. इस परीक्षा में दूर का सम्बन्ध होता है।
4. इस परीक्षा में वह केवल सामान्य अध्ययन कर सकता है।
5. इस परीक्षा में वह कारणों का पता नहीं लगा सकता है।
6. इस परीक्षा में वह उदासीन रह सकता है।
7. इस परीक्षा से केवल आंशिक ज्ञान होता है।
8. इस परीक्षा के प्रश्नों को कम परिश्रम और योग्यता से भी बनाया जा सकता है।
9. इस परीक्षा के निष्कर्ष कम प्रामाणिक और विश्वसनीय होते हैं।
10. इस परीक्षा के लिये कम धन और समय की आवश्यकता है।

उपर्युक्त विवेचन के आधार पर यह कहना असंगत न होगा कि सामूहिक परीक्षाओं की तुलना में वैयक्तिक परीक्षाएँ श्रेष्ठतर हैं। प्रशिक्षित परीक्षक, अधिक धन और समय की आवश्यकता के कारण इन परीक्षाओं का सामान्य रूप से व्यवहार में लाया जाना सम्भव नहीं है। यही कारण है कि सामूहिक परीक्षाओं की लोकप्रियता में निरन्तर वृद्धि होती चली जा रही है।

क्रियात्मक परीक्षाओं की आवश्यकता एवं महत्व

आधुनिक समय में क्रियात्मक बुद्धि-परीक्षाओं के प्रयोग का प्रबल समर्थन किया जा रहा है। इसका मुख्य कारण है-उनकी आवश्यकता और उपयोगिता इस सम्बन्ध में निम्नांकित तथ्य अवलोकनीय हैं 
  • ये परीक्षाएँ लिखित परीक्षाओं की पूरक होने के कारण बुद्धि के माप को अधिक विश्वसनीय बनाती हैं।
  • इन परीक्षाओं की सहायता से मूर्त बुद्धि का सरलता से अनुमान लगाया जा सकता है।
  • इन परीक्षाओं को गूंगे, बहरे, मन्द बुद्धि और अन्य प्रकार से अशक्त बालकों के लिए व्यवहार में लाया जा सकता है।
  • इन परीक्षाओं को विभिन्न भाषाओं और संस्कृतियों के व्यक्तियों की मानसिक योग्यताओं की तुलना करने के लिए प्रयोग किया जा सकता है।
  • इन परीक्षाओं को निरक्षर और कम पढ़े-लिखे व्यक्तियों एवं अल्प आयु के बालकों के लिए, जिनको भाषा का कम ज्ञान है, सफलतापूर्वक प्रयोग में लाया जा सकता
  • क्रो एवं क़ो का कथन है - “कुछ मनोवैज्ञानिकों का दावा है कि भाषात्मक परीक्षाओं की अपेक्षा क्रियात्मक परीक्षाएँ मानसिक योग्यताओं का सम्भवतः अधिक उत्तम मापन कर सकती हैं।"

बुद्धि परीक्षाओं की उपयोगिता

गेट्स व अन्य का कथन है - "बुद्धि-परीक्षाएँ, व्यक्ति की सम्पूर्ण योग्यता का माप नहीं करती हैं। पर वे उसके एक अति महत्वपूर्ण पहलू का अनुमान कराती हैं, जिसका शैक्षिक सफलता से और कुछ मात्रा में अधिकांश अन्य क्षेत्रों से निश्चित सम्बन्ध है। यही कारण है कि बन्दि परीक्षाएँ शिक्षा की महत्वपूर्ण साधन बनगई हैं।" शिक्षा में इनका प्रयोग अनेक व्यावहारिक कार्यों के लिए किया जाता है -

सर्वोत्तम बालक का चुनाव 

बुद्धि परीक्षाओं की सहायता से विद्यालय प्रवेश, छात्रवृत्तियों, वाद-विवाद और इसी प्रकार की अन्य प्रतियोगिताओं के लिए सर्वोत्तम बालकों का चुनाव किया जा सकता है।

पिछड़े हुए बालकों का चुनाव 

बुद्धि परीक्षाओं का प्रयोग करके, पिछड़े हुए और मानसिक एवं शारीरिक दोषों वाले बालकों का सरलता से चुनाव किया जा सकता है। चुनाव किए जाने के बाद उनको शिक्षा प्राप्त करने के लिए विशिष्ट विद्यालयों में भेजा जा सकता है। 

अपराधी व समस्यात्मक बालकों का सुधार 

बुद्धि परीक्षाओं द्वारा यह मालूम करने का प्रयास किया जाता है कि बालक- अपराधी, असंतुलित और समस्यात्मक क्यों हैं? वे ऐसे बुद्धि की कमी के कारण हैं या किसी अन्य कारण से ? कारण ज्ञात हो जाने पर उनका उपचार करके उनमें सुधार किया जा सकता है।

बालकों का वर्गीकरण 

बुद्धि परीक्षाओं के आधार पर कक्षा के बालकों को तीव्र बुद्धि, मन्द बुद्धि और साधारण बुद्धि वाले बालकों में विभक्त करके, उनको अलग-अलग शिक्षा दी जा सकती है। इंगलैण्ड में बालकों का वर्गीकरण इसी प्रकार किया जाता है। इसीलिए वहाँ प्रत्येक कक्षा में तीन सेक्शन हैं।

बालकों की क्षमता के अनुसार कार्य 

गेट्स एवं अन्य के अनुसार बुद्धि-परीक्षाओं द्वारा बालकों की सामान्य योग्यता और मानसिक आयु को ज्ञात करके यह अनुमान लगाया जा सकता है कि उनमें कार्य करने की कितनी क्षमता है। अतः उनको उनकी क्षमता के अनुसार कार्य दिया जा सकता है।

बालकों की विशिष्ट योग्यताओं का ज्ञान 

बुद्धि-परीक्षाओं की सहायता से बालकों की विशिष्ट योग्यताओं की जानकारी प्राप्त करके, उनको उचित शैक्षिक निर्देशन दिया जा सकता है। अतः वे अधिक प्रगति कर सकते हैं। 

बालकों की व्यावसायिक योग्यता का ज्ञान 

बुद्धि-परीक्षाओं का सतर्कता से प्रयोग करके, बालकों की व्यावसायिक योग्यताओं का अनुमान लगाया जा सकता है। अतः उन्हें अपनी योग्यताओं के अनुसार व्यवसायों का चयन करने के लिए परामर्श दिया जा सकता है। 

बालकों को भावी सफलताओं का ज्ञान 

डगलस एवं हालैण्ड का कथन है - “बुद्धि-परीक्षाएँ, छात्रों की भावी सफलताओं की भविष्यवाणी करती हैं।" इस भविष्यवाणी से बालकों का महान हित हो सकता है। उनके माता-पिता उनके भावी सफल कार्यों को ध्यान में रखकर उनके लिए शिक्षा की उपयुक्त व्यवस्था कर सकते हैं। फलस्वरूप, बालक अपने भावी जीवन में सफल हो सकते हैं।

अपव्यय का निवारण 

सब बालकों में सब विद्यालय विषयों के लिए समान योग्यता नहीं होती है। फलस्वरूप, अनेक बालक परीक्षाओं में अनुत्तीर्ण होने के कारण विद्याध्ययन स्थगित कर देते हैं। इस अपव्यय का निवारण करने के लिए बुद्धि परीक्षाओं द्वारा बालकों की योग्यताओं को ज्ञात कर लिया जाता है और इन योग्यताओं के अनुसार उनको पाठ्य-विषयों का चुनाव करने का निर्देशन दिया जाता है।

राष्ट्र के बालकों की बुद्धि का ज्ञान 

बुद्धि-परीक्षाओं द्वारा राष्ट्र के किसी वयस्क वर्ग के बालकों की बौद्धिक योग्यता को ज्ञात किया जा सकता है। इससे यह जानकारी प्राप्त की जा सकती है कि एक राष्ट्र के बालकों का बौद्धिक स्तर दूसरे राष्ट्रों के बालकों से कितना कम या अधिक है। इसी उद्देश्य से स्कॉटलैंड में 1932 में 11 वर्ष के सब बालकों की सामूहिक बुद्धि परीक्षा ली गई थी।

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