अभिक्रमित अनुदेशन का अर्थ, परिभाषा, सिद्धान्त | Programmed Instruction

अभिक्रमित अनुदेशन क्या है? इसके निहित सिद्धान्त कौन-कौन से हैं? अभिक्रमित अनुदेशन की परिभाषा दीजिये। इसकी प्रकृति तथा विशेषताएँ बताइये।
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Programmed Instruction

अभिक्रमित अनुदेशन (Programmed Instruction)

Programmed Instruction is a planned sequence of experiences, leading to proficiency, in terms of stimulus-response relationship have proved to be effective. - Espich and Williams.

अभिक्रमित अनुदेशन का अर्थ

शिक्षा के क्षेत्र में, शिक्षा, शिक्षण के माध्यम से अधिगम की क्रिया सम्पन्न कराती है। यह क्रिया बालकों में नवीन एवं प्रथम अनुभव प्रदान करती है तथा अनुभव को स्थायी रूप देकर सीखने की क्रिया को गतिशील बनाती है, सीखे गये अनुभवों से पुनः लाभ उठाने की योग्यता तथा परिस्थिति के अनुसार कार्य करने की क्षमता का विकास करती है।

अभिक्रमित अनुदेशन का अर्थ है किसी योजना के अनुसार शिक्षण एवं अधिगम की क्रिया को साकार रूप प्रदान करना। इसका लक्ष्य है - अधिगम को सोद्देश्य एवं स्थायी बनाना। प्राचीनकाल में यह विधि भारत तथा यूनान में प्रचलित रही है और इसका स्वरूप प्रश्नोत्तर रहा है। रेखागणित के शिक्षण में इस विधि का प्रयोग बहुतायत में किया गया है।
आधुनिक काल में, अमेरिका के स्टेट विश्वविद्यालय ओहियो में सिडनी एल. प्रेसे ने प्राचीनकाल की इस अवधारणा को नये परिवेश में प्रयोग किया और इसे प्रोग्राम्ड इन्सट्रक्सन नाम दिया। शिक्षण मशीनों के विकास के कारण यह अधिगम स्वरूप प्रयोगात्मक स्थिति से उभर कर शोध एवं प्रयोग के क्षेत्र में आया और आज अमेरिका तथा इंग्लैण्ड के विश्वविद्यालयों, विद्यालयों में यह शिक्षण विधि का एक अंग बन गया है।

अभिक्रमित अनुदेशन की परिभाषाएँ

अभिक्रमित अनुदेशन, शिक्षण अधिगम के क्षेत्र में एक प्रभावशाली आधुनिक नवाचार है। विद्वानों ने अभिक्रमित अनुदेशन की परिभाषाएँ इस प्रकार दी हैं

स्मिथ एवं पूरे - अभिक्रमित अनुदेशन किसी अधिगम सामग्री को क्रमिक पदों की श्रृंखला में व्यवस्थित करने वाली प्रक्रिया है और प्रायः इसके द्वारा किसी विद्यार्थी को उसकी परिचित पृष्ठभूमि से संप्रत्ययों, प्रानियमों और बोध के एक जटिल और नवीन स्तर पर लाया जाता है।

एस्पिच एवं विलियम्स - अभिक्रमित अनुदेशन से अभिप्राय अनुभवों की उस नियोजित श्रृंखला से है जो उद्दीपक-अनुक्रिया सम्बन्ध के संदर्भ में प्रभावशाली माने जाने वाली दक्षता की ओर अग्रसर करती है।

सूसन मार्कले - अभिक्रमित अनुदेशन पुनः प्रस्तुत की जाने वाली क्रिया की संरचित विधि है जिसकी सहायता से व्यक्तिगत रूप से छात्र के व्यवहार में मापन योग्य विश्वसनीय परिवर्तन लाया जा सकता है।

एन. एस. मावी - अभिक्रमित अनुदेशन, अनुदेशनात्मक क्रिया को स्व-अनुदेशन एवं स्व-अधिगम में परिवर्तित करने की तकनीक है। इसमें विषय वस्तु को छोटी-छोटी श्रृंखलाओं में विभाजित किया जाता है। अधिगमकर्ता इन्हें पढ़ कर सही / गलत अनुक्रिया करता है। गलत अनुक्रियाओं को ठीक करता है, सही अनुक्रियाओं की पुष्टि करता है। वह सूक्ष्म श्रृंखला में पारंगत होने का प्रयास करता है।

इन सभी परिभाषाओं का विश्लेषण करने पर अभिक्रमित अनुदेशन की ये विशेषताएँ-
  • यह स्व-अनुदेशन तकनीक है। इसमें छात्र एक कार्यक्रम के उभरती हैं अन्तर्गत पाठ्य पुस्तक, शिक्षण मशीन आदि के द्वारा शिक्षण अधिगम की क्रिया सम्पन्न करता है।
  • इसमें सामग्री को तर्कसंगत क्रम में, छोटे-छोटे पदों में विभक्त किया जाता है। इन पदों को फ्रेम कहते हैं। 
  • अभिक्रमित अनुदेशन में छात्र के प्रवेश तथा अन्तिम व्यवहार को ध्यान में रखा जाता है। 
  • प्रत्येक फ्रेम स्पष्ट, तर्कसंगत, सार्थक होने के कारण छात्र की बौद्धिक अनुक्रिया प्राप्त करने की दिशा में क्रियाशील होता है। 
  • अभिक्रमित अनुदेशन में पुनर्बलन के सिद्धान्तों की पुष्टि होती है। जब सीखने वाले को यह पता चल जाता है कि उसका उत्तर सही है या गलत तो उसे आगे बढ़ने या संशोधन करने का पुनर्बलन प्राप्त होता है।
  • अभिक्रमित अनुदेशन में छात्र तथा विषय सामग्री के प्रति अन्तःक्रिया होती है। 
  • इसमें छात्र को अपनी योग्यता तथा सामर्थ्य के अनुसार सीखने के अवसर प्राप्त होते है
  • इस प्रकार के अनुदेशन में सीखने वाले को बाह्य अनुक्रिया पर निर्भर रहना पड़ता है, इनका निरीक्षण एवं मापन किया जा सकता है। 
  • अभिक्रमित अनुदेशन में मूल्यांकन सतत् होता है ।

अभिक्रमित अनुदेशन के सिद्धान्त 

अभिक्रमित अनुदेशन, स्वयं एक शैक्षिक नवाचार है। इसमें शिक्षा, शिक्षण तथा शिक्षा मनोविज्ञान के अनेक सिद्धान्त निहित हैं जो इस प्रकार हैं-

लघुपदीय सिद्धान्त (Principles of Small Steps)

यह सिद्धान्त सीखने की खण्ड विधि पर आधारित है। इसमें सिखाई जाने वाली सामग्री या विषय वस्तु को छोटे-छोटे पदों या फ्रेम में विभक्त किया जाता है फिर छात्र के सम्मुख प्रस्तुत किया जाता है। 

सक्रिय अनुक्रिया सिद्धान्त (Principle of Active Response) 

यह सिद्धान्त बी. एफ. स्किनर द्वारा प्रतिपादित सक्रिय (Operant) अनुकूलन सिद्धान्त पर आधारित है। इस मत के अनुसार सीखने की आवश्यक शर्त सक्रियता है।

तात्कालिक संपुष्टि सिद्धान्त (Principle of Immediate Reinforcement)

यह सिद्धान्त थार्नडाइक के संतोषप्रद अनुभव सिद्धान्त पर आधारित है। संतोषप्रद अनुभव ही, किसी व्यक्ति को सीखने की प्रेरणा देते हैं। 

स्वगति सिद्धान्त (Principle of Self Pacing) 

यह अनुदेशन स्वाध्याय एवं स्व-अधिगम पर आधारित है। इसमें सीखने वाला अपनी योग्यता तथा क्षमता के अनुसार एक फ्रेम से दूसरे फ्रेम तक जाने का प्रयास करता है। 

छात्र परीक्षण सिद्धान्त (Principle of Student Testing ) 

इस अनुदेशन में छात्र विषय वस्तु के प्रति छोटे-छोटे फ्रेमों के माध्यम से अपनी अनुक्रिया व्यक्त करता है। इससे उसकी निष्पत्ति का रिकार्ड रखने में सुविधा होती है। छात्र इस रिकार्ड के द्वारा अपना मूल्यांकन स्वयं कर सकता है।


अभिक्रमित अनुदेशन की व्यूह रचना

अभिक्रमित अनुदेशन की व्यूह रचना में विषय वस्तु, छात्र अनुक्रिया तथा परिणाम का विशेष महत्व है। इसकी व्यूह रचना में ये तथ्य शामिल हैं-
  • इसमें पाठ्यपुस्तक तथा शिक्षण मशीनों का उपयोग किया जाता है।
  • पाठ्य वस्तु को छोटे-छोटे फ्रेमों में विभक्त किया जाता है। 
  • छात्र के प्रवेश व्यवहार, अनुक्रिया तथा अन्तिम व्यवहार को ध्यान में रखा जाता है। 
  • छात्र, पदों के प्रति अनुक्रिया करता है। सही अनुक्रिया होने पर ही आगे बढ़ता है।
  • इसमें छात्र स्वयं सीखता है तथा अपना मूल्यांकन स्वयं करता है। 
  • इसे शिक्षण अधिगम की सतत् प्रक्रिया के रूप में अपनाया जा सकता है।

अभिक्रमित अनुदेशन के लाभ (Asvantages if programmed learning)

शिक्षा के क्षेत्र में अभिक्रमित अनुदेशन का प्रयोग शैक्षिक नवाचार के रूप में अनुसंधान के क्षेत्र में किया जा रहा है। इसको उपयोगी साधन के रूप में अपनाया जा रहा है। इसके लाभ इस प्रकार हैं-
  • यह छात्र के व्यक्तिकरण में अत्यन्त उपयोगी है। 
  • छात्र अपनी योग्यता तथा क्षमता के अनुसार सीखता है।
  • शिक्षण मशीनों तथा अन्य प्रकार की शिक्षण सामग्री का उपयोग किया जा सकता है। 
  • पारम्परिक, बोझिल शिक्षण क्रिया से मुक्ति मिलती है।
  • कक्षागत वातावरण सामाजिक बन जाता है। अनुशासन प्रभावपूर्ण बन जाता है। 
  • यह एक प्रभावपूर्ण शिक्षक तकनीक है जिसमें छोटे-छोटे पदों में विषय वस्तु को विभक्त किया जाता है।
  • पाठ्यक्रम की पुनर्रचना में सहायता मिलती है।
  • इससे सर्जनात्मक चिन्तन, योग्यता, तर्क, विवेक, विभेद, निर्णय क्षमता आदि का विकास होता है।
  • जटिल व्यवहार तथा कौशल के अर्जन में सहायक है।

अभिक्रमित अनुदेशन की सीमाएँ (Limitations of programmed instruction)

अभिक्रमित अनुदेशन अभी प्रयोग तथा अनुसंधान की स्थिति में है। इसलिये इसका व्यापक उपयोग नहीं हो पा रहा है। अभिक्रिमित अनुदेशन की सीमाएँ इस प्रकार हैं-
  • योग्यतापूर्ण एवं क्षमतावान प्रोग्रामर्स का अभाव होने के कारण शिक्षण कार्यक्रम नहीं बन पाते।
  • अभिक्रमित सामग्री में वैयक्तिक भेदों का ध्यान कम रखा जाता है।
  • सभी विषयों तथा प्रकरणों के कार्यक्रम बनाना सम्भव नहीं है। 
  • शिक्षण अधिगम केवल यांत्रिक रह जाता है।

अभिक्रमित अनुदेशन के प्रकार (Types of programmed instruction)

यों तो अभिक्रमित अनुदेशन एक सम्पूर्ण शैक्षिक कार्यक्रम है, किन्तु इसकी रचना के आधार पर अभिक्रमित अनुदेशन का वर्गीकरण इस प्रकार किया जा सकता है-
  • रेखीय अभिक्रमित अनुदेशन
  • शाखीय अभिक्रमित अनुदेशन 
  • मैथेटिक्स अभिक्रमित अनुदेशन 

रेखीय अभिक्रमित अनुदेशन (Linear programmed istruction)

रेखीय अभिक्रमित अनुदेशन में वांछित अनुक्रिया, पुनर्बलन पर आधारित होती है। इसके द्वारा व्यक्ति अपने इच्छित अन्तिम व्यवहार तक पहुँचता है। रेखीय अभिक्रमित अधिगम बी. एफ. स्किनर ने क्रिया प्रसूत अधिगम के आधार पर विकसित किया। इसमें विषय-वस्तु को छोटे-छोटे फ्रेम या पदों में बाँटा जाता है। ये पद शृंखलाबद्ध होते हैं। इसकी प्रक्रिया इस प्रकार है-
  • फ्रेम, छात्र के सम्मुख प्रस्तुत किये जाते हैं। छात्र स्वयं भी श्रृंखला क्रम में इन फ्रेमों को अपने समक्ष रखता है।
  • छात्र जब फ्रेम के प्रति अनुक्रिया करता है तो उसे सही या गलत उत्तर मिलता है।
  • सही की सूचना से उसे आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती है। 
  • यों वह एक पद से दूसरे पद पर पहुँचता है और अन्त में अपने लक्ष्य तक पहुँचता है।
इस अनुदेशन में, अभिक्रम स्पष्ट, क्रमबद्ध एवं परस्पर सम्बन्धित होता है। इसलिये इसे रेखीय (Linear) कहा जाता है। इसका नियंत्रण प्रोग्राम निर्माता के हाथों में होता है। इसलिये इसे बाह्य अभिक्रमित अनुदेशन भी कहा जाता है। इसके द्वारा विषय की अवधारणाएँ स्पष्ट किये जाते हैं। उदाहरण इस प्रकार है.

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रेखीय अभिक्रमित अनुदेशन के गुण 
(Advantages of Linear Programmed Instruction)

रेखीय अभिक्रमित अनुदेशन के गुण इस प्रकार हैं -
  1. दिये गये फ्रेमों में अतिरिक्त संकेतों के कारण अनुक्रिया करने में सहायता मिलती है। और त्रुटिदर कम होती है। 
  2. सही उत्तर दिखाये जाते हैं ताकि बेईमानी न हो सके। 
  3. छोटे-छोटे पर्दो की अधिकता रहती है। इनमें दक्षता प्राप्त करने पर ही छात्र, आगे बढ़ पाता है।

रेखीय अभिक्रमित अनुदेशन के दोष 
(Limitations of Linear Programmed Instruction) 

रेखीय अभिकमित अनुदेशन की सीमाएँ इस प्रकार हैं-
  1. समरसता के कारण यह नीरस हो जाता है। छोटे पद और उन पर नियंत्रण के कारण ऐसा होता है। सीखने की गति अत्यन्त धीमी होती है।
  2. सभी विषयों में रेखीय अभिक्रम नहीं बनाया जा सकता। 
  3. इसमें अभिव्यक्ति के पूर्ण अवसर नहीं मिल पाते।
  4. पदों में भिन्नता न होने से विभेद शक्ति उत्पन्न नहीं होती।
  5. अनुमान के अवसर मिलते हैं।
  6. आवश्यक नहीं है कि फ्रेमों की रचना छात्रों के पूर्व ज्ञान पर आधारित ही हो।

शाखीय अभिक्रमित अनुदेशन (Branching Programmed Instruction)

शाखीय अभिक्रमित अनुदेशन का विकास करने का श्रेय नार्मन ए. क्राउडर को है। यह अभिक्रम छात्रों की आवश्यकता के अनुसार होता है तथा इसमें बाह्य उपकरण की आवश्यकता नहीं होती। इसमें प्रोग्राम, शिक्षक के हाथों में होता है। 
इसे आन्तरिक अभिक्रम भी कहते हैं। शाखीय अभिक्रम के पद इस प्रकार हैं-
  1. विषय सामग्री को खण्डों में विभक्त किया जाता है। विषय सामग्री अंश अधिक रहता है। इनके फ्रेम बड़े होते हैं।
  2. फ्रेम पढ़कर छात्रों को सही विकल्प का चयन करना पड़ता है। सही विकल्प प्रस्तुत करने पर ही उसे अगल फ्रेम दिया जाता है। 
  3. अतिरिक्त जानकारी के लिये उसे अतिरिक्त फ्रेम पढ़ने के लिये कहा जाता है। इनके आधार पर वह अपनी त्रुटियाँ समझ लेता है। 
  4. त्रुटियाँ दूर करने के पश्चात् उसे अपने पूर्व व्यवहार पर आना पड़ता है।
  5. यह क्रम उस समय तक चलता रहता है जब तक छात्र, विषय सामग्री को सम्पूर्ण रूप से समझ नहीं लेता।

शाखीय अभिक्रम के गुण (Merits of Branching Programmed) 


शाखीय अभिक्रम के गुण इस प्रकार हैं-
  1. इसमें ट्यूटर उपस्थित नहीं होता किन्तु निर्देश वही होते हैं जो ट्यूटर देता है।
  2. छात्रों के पूर्व ज्ञान पर आधारित पद होते हैं।
  3. बड़े पद होते हैं।
  4. अनेक विकल्प होते हैं।
  5. सही एवं गलत, दोनों अनुक्रियाओं से सीखता है। 
  6. विभेद, सृजन, समस्या समाधान आदि के अवसर मिलते हैं।
  7. उच्चस्तरीय ज्ञान पर आधारित होता है। 

शाखीय अभिक्रम के दोष (Demerits of Branching Programmed)

  1. अटकलबाजी की संभावनाएँ अधिक होती हैं। 
  2. बहुविकल्प प्रश्न तथा पद रचना में कठिनाई होती है।
  3. वैयक्तिक भेद के आधार पर शाखाओं का निर्माण करना कठिन होता है। 
  4. अनेक शाखाएँ यथा, पुस्तकें, निर्देशिका, आडियो, वीडियो टेप, वी. सी. आर., टेप आदि के उपयोग के कारण यह महँगा सिद्ध हुआ है।

मैथेटिक्स अभिक्रमित अनुदेशन (Mathetics Programmed Instruction)

मैथेटिक्स अभिक्रमित अनुदेशन का प्रतिपादन, थामस एफ. गिलबर्ट ने किया। उसका कथन है - मैथेटिक्स से तात्पर्य जटिल व्यवहार समूह के विश्लेषण एवं पुनर्रचना के लिये पुनर्बलन के सिद्धान्तों के व्यवस्थित प्रयोग से है। यह विषय वस्तु में निपुणता का प्रतिनिधित्व करती है।
मैथेटिक्स अभिक्रम जटिल है। इसको सम्पादन करने में तकनीकी दक्षता की आवश्यकता पड़ती है। एक बार जब व्यक्ति इसमें पारंगत हो जाता है तो फिर मैथेटिक्स अभिक्रम सरल एवं उपयोगी प्रतीत होता है। 
इस अभिक्रम के पद इस प्रकार हैं-
  1. अधिगम सामग्री का विश्लेषण किया जाता है।
  2. अधिगम की इकाई फ्रेम नहीं होते बल्कि अभ्यास तथा समस्या होते हैं। 
  3. इसमें परिणाम की जानकारी पुनर्बलन के द्वारा प्राप्त की जाती है।
  4. इसमें अवरोही (Retrogressive) श्रृंखला के सिद्धान्त का प्रयोग किया जाता है।
  5. इसमें प्रदर्शन, अनुबोधन तथा उन्मुक्ति पद निहित होते हैं। 
  6. पहले पद की अनुक्रिया अन्त में करनी पड़ती है।

मैथेटिक्स अभिक्रम की सीमाएँ (Limitations of Mathetic Programmed) 

मैथेटिक्स अभिक्रम की सीमाएँ इस प्रकार हैं-
  1. मैथेटिक्स अभिक्रम का निर्माण कार्य अत्यन्त जटिल है। 
  2. इसके निर्माण तथा सम्पादन के लिये वांछित प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है।
  3. यह केवल स्थूल सामग्री, मनोशारीरिक कौशलों के शिक्षण के लिये उपयोगी है। 
  4. वैयक्तिक भिन्नताओं का ध्यान नहीं रखा जाता।

अभिक्रमित अनुदेशन का निर्माण (Preparing Programmed Instruction) 

अभिक्रमित अनुदेशन का निर्माण करने के लिये तीन अवस्थाओं से गुजरना पड़ता है।

तैयारी की अवस्था (Preparatory Stage)

  • इकाई का चयन
  • छात्र के विषय में लिखना
  • व्यावहारिक लक्ष्यों को लिखना 
  • विषय वस्तु की विशिष्ट रूपरेखा का निर्माण
  • मानंदण्ड परीक्षण की रचना

विकासात्मक अवस्था (Development Phase)

  • अभिक्रम शैली का चयन
  • श्रृंखला तथा पदों का प्रस्तुतीकरण
  • पद निर्माण
  • प्रतिपुष्टि तथा पुनर्बलन 
  • पर्दो का सम्पादन

मूल्यांकन अवस्था (Evaluative Phase)

  • व्यक्तिगत परीक्षण 
  • लघु समूह परीक्षण 
  • क्षेत्र परीक्षण 
  • प्रामाणिकता 
  • विवरण पुस्तक 

अभिक्रमित अनुदेशन की उपयोगिता (Utility of Programmed Instruction) 

अभिक्रमित अनुदेशन एक तकनीकी शैक्षिक प्रणाली है जिसका उपयोग छात्रों में वांछित लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु किया जाता है। इसकी उपयोगिता इस प्रकार है-

वैयक्तिकरण में सहायक (Helpful in Individualization) 

स्वगति एवं स्वअधिगम के कारण, अभिक्रमित अधिगम व्यक्ति के निजी गुणों, क्षमताओं तथा योग्यताओं को विकसित करने में सहायक है। 

शिक्षण मशीनों का उपयोग (Use of Teaching Machines) 

अभिक्रमित अनुदेशन, कार्यक्रम बनाते समय शिक्षण मशीनों के उपयोग की संभावनाओं का भी ध्यान रखा गया है। इस प्रकार स्वशिक्षा, समस्या समाधान, शिक्षकों के अभाव की पूर्ति तथा जनशिक्षा के प्रसार में अभिक्रमित अनुदेशन उपयोगी सिद्ध होता है। इससे स्वशिक्षा का विकास होता है। 

शिक्षक के श्रम में कमी (Reduction in Teacher's Work ) 

अभिक्रमित अनुदेशन में शिक्षक का कार्य केवल मार्गदर्शन रह जाता है, इसलिये उसे परम्परागत शिक्षण प्रणाली से मुक्ति मिल जाती है।

शैक्षिक वातावरण का निर्माण (Creation of Educational Climate ) 

अभिक्रमित अनुदेशन कक्षा के सामाजिक वातावरण, शैक्षिक प्रबन्ध, अनुशासन आदि का निर्माण करने में योग देता है।

प्रभावपूर्ण शिक्षण तकनीकी (Effective Teaching Technology) 

अभिक्रमित अनुदेशन एक प्रभावपूर्ण शिक्षण तकनीक के रूप में उपयोगी सिद्ध हुआ है। इसमें 
  • विषय वस्तु का विश्लेषण 
  • उद्देश्य निर्धारण 
  • पुनर्बलन तथा प्रतिपुष्टि 
  • स्वाध्याय तथा स्व शिक्षण 
  • सक्रियता एवं सजगता 
  • उचित मूल्यांकन छात्र के द्वारा ही किया जाता है। 
इसलिये यह एक प्रभावशाली शिक्षण तकनीक है।

नियोजन एवं व्यवस्थापन (Planning and Management)  

अभिक्रमित अनुदेशन पाठ्य वस्तु के नियोजन एवं प्रबन्ध में विशेष योग देता है। पाठ्यक्रम में सुधार होता है।

उपचारात्मक पक्ष (Remedial Aspect)

अभिक्रमित अनुदेशन में छात्र की शैक्षिक त्रुटियों को दूर किया जाता है, इसलिये यह उपचारात्मक भी है। उपचार के पश्चात् उसे भविष्य के लिये मार्गदर्शन दिया जाता है।

छात्र की शक्तियों का विकास 

(Development of the Capacities of the Students) 
अभिक्रमित अनुदेशन के द्वारा छात्रों की सर्जनात्मक, तर्क, चिन्तन, विभेद, निर्णय, विवेक शक्तियों का विकास होता है। अनेक गत्यात्मक कौशल भी विकसित होते हैं।


अभिक्रमित अनुदेशन ने शिक्षा तथा शिक्षण के सभी क्षेत्रों में शैक्षिक ज्ञान, कौशल तथा तकनीक के विकास में विशेष योग दिया है। यद्यपि इसके अत्यधिक प्रयोग से यह भय अवश्य है कि भविष्य में शिक्षक की आवश्यकता नहीं रहेगी; किन्तु यह भय निर्मूल है। शिक्षक के बिना न कोई अभिक्रम बन सकता है और न छात्र ही स्वाध्याय के पथ पर बढ़ सकता है; इसलिये शिक्षक की भूमिका तो महत्वपूर्ण रहेगी ही।
अभिक्रमित अनुदेशन से समय की बचत होती है। स्वाध्याय की प्रेरणा मिलती है और समयानुसार स्वशिक्षण तथा स्वअधिगम की क्षमता तथा कौशल का विकास होता है।

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